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भगवद् गीता 11.25

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि | दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ||११-२५||
daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāni dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāni . diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsa ||11-25||
तुम्हारे दाँतों से भरे भयंकर मुखों को देखकर, जो प्रलय की अग्नि के समान हैं, मैं चारों दिशाओं को नहीं जानता और शांति नहीं पाता। हे देवताओं के प्रभु, हे विश्व के निवासी, कृपया प्रसन्न हों।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत

11.25 दंष्ट्राकरालानि दाँतों से भरे हुए? च और? ते तुम्हारे? मुखानि मुख? दृष्ट्वा देखकर? एव ही? कालानलसन्निभानि प्रलय की अग्नि के समान? दिशः चारों दिशाएं? न नहीं? जाने जानता हूँ? न नहीं? लभे प्राप्त? च और? शर्म शांति? प्रसीद कृपया प्रसन्न हों? देवेश हे देवताओं के प्रभु? जगन्निवास हे विश्व के निवासी।टिप्पणी जगन्निवास विश्व का आधार।कालानल वे अग्नि जो विश्व के अंतिम विघटन (प्रलय) के समय सभी लोकों को भस्म करती हैं। काल (समय) सभी प्रकट वस्तुओं का भक्षक है।दिशो न जाने मैं चारों दिशाओं को नहीं जानता। मैं पूर्व को पश्चिम से, उत्तर को दक्षिण से अलग नहीं कर सकता।

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