तुम अक्षय हो, सर्वोच्च सत्ता हो, जानने योग्य हो। तुम इस ब्रह्मांड का महान भंडार हो; तुम अक्षय धर्म के रक्षक हो; तुम आदि पुरुष हो, मेरा यही विचार है।
अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दार्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
11.18 त्वम् तुम? अक्षरम् अक्षय? परमम् सर्वोच्च सत्ता? वेदितव्यम् जानने योग्य? त्वम् तुम? अस्य (इस) का? विश्वस्य ब्रह्मांड का? परम् महान? निधानम् भंडार? त्वम् तुम? अव्ययः अक्षय? शाश्वतधर्मगोप्ता शाश्वत धर्म के रक्षक? सनातनः आदि? त्वम् तुम? पुरुषः पुरुष? मतः माना? मे मेरा।विस्तृत अर्थ निधानम् इस ब्रह्मांड का भंडार, आश्रय या आधार भी कहा जाता है। इसी कारण ब्रह्मांड के सभी प्राणी संरक्षित और सुरक्षित रहते हैं। यह अक्षय स्रोत है जिससे भक्त सदा जुड़ता है। वास्तव में वे भटके हुए हैं जो इस दिव्य भंडार को अनदेखा करते हैं और इंद्रियों के विषयों की परछाई के पीछे भागते हैं।वेदितव्यम् मोक्ष के साधकों द्वारा श्रवण (शास्त्र सुनना), मनन (चिंतन) और निदिध्यासन (ध्यान) के माध्यम से जानने योग्य।अव्ययः का अर्थ है अक्षय, अपरिवर्तनशील, अमर।
इस श्लोक पर आनंद के साथ चिंतन करें
यह श्लोक आपमें क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ग्रहण करता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।
11.18 त्वम् तुम? अक्षरम् अक्षय? परमम् सर्वोच्च सत्ता? वेदितव्यम् जानने योग्य? त्वम् तुम? अस्य (इस) का? विश्वस्य ब्रह्मांड का? परम् महान? निधानम् भंडार? त्वम् तुम? अव्ययः अक्षय? शाश्वतधर्मगोप्ता शाश्वत धर्म के रक्षक? सनातनः आदि? त्वम् तुम? पुरुषः पुरुष? मतः माना? मे मेरा।विस्तृत अर्थ निधानम् इस ब्रह्मांड का भंडार, आश्रय या आधार भी कहा जाता है। इसी कारण ब्रह्मांड के सभी प्राणी संरक्षित और सुरक्षित रहते हैं। यह अक्षय स्रोत है जिससे भक्त सदा जुड़ता है। वास्तव में वे भटके हुए हैं जो इस दिव्य भंडार को अनदेखा करते हैं और इंद्रियों के विषयों की परछाई के पीछे भागते हैं।वेदितव्यम् मोक्ष के साधकों द्वारा श्रवण (शास्त्र सुनना), मनन (चिंतन) और निदिध्यासन (ध्यान) के माध्यम से जानने योग्य।अव्ययः का अर्थ है अक्षय, अपरिवर्तनशील, अमर।