```html
बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha इंस्टॉल करें

भगवद् गीता 11.15

अर्जुन उवाच | पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् | ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ||११-१५||
arjuna uvāca . paśyāmi devāṃstava deva dehe sarvāṃstathā bhūtaviśeṣasaṅghān . brahmāṇamīśaṃ kamalāsanasthaṃ ṛṣīṃśca sarvānuragāṃśca divyān ||11-15||
अर्जुन ने कहा: हे भगवान्, मैं तुम्हारे शरीर में सभी देवताओं को देखता हूँ, और सभी प्रकार की प्राणियों की भीड़ को भी देखता हूँ। ब्रह्मा, जो कमल के आसन पर बैठे हैं, सभी ऋषियों और दिव्य नागों को देखता हूँ।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत

11.15 पश्यामि (मैं) देखता हूँ? देवान् देवता? तव तुम्हारे? देव हे भगवान्? देहे शरीर में? सर्वान् सभी? तथा भी? भूतविशेषसङ्घान् विभिन्न प्रकार की प्राणियों की भीड़? ब्रह्माणम् ब्रह्मा? ईशम् प्रभु? कमलासनस्थम् कमल के आसन पर बैठे? ऋषीन् ऋषि? च और? सर्वान् सभी? उरगान् नाग? च और? दिव्यान् दिव्य।व्याख्या अर्जुन इस और निम्नलिखित श्लोकों (15 से 31) में अपने ब्रह्मांडीय रूप का वर्णन करता है।भूतविशेषसङ्घन विभिन्न प्रकार की प्राणियों की भीड़, जीवित और निर्जीव दोनों। ये अनेक इकाइयाँ तुम्हारे ब्रह्मांडीय रूप में हैं, जैसे मानव शरीर पर बाल।ब्रह्मा, चारमुखी, सभी प्राणियों का प्रभु, पृथ्वी-कमल के केंद्र में, मेरु पर बैठा है, जो पृथ्वी-कमल की पुंकेसर के रूप में है।ऋषि, जैसे वसिष्ठ। नाग, जैसे वासुकि।इसके अलावा --

आनंद के साथ इस श्लोक पर विचार करें

यह श्लोक आपके भीतर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक मार्ग, एक प्रश्न, हर रविवार। कुछ नहीं और कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी