हे अर्जुन, मेरी दिव्य शक्तियों का कोई अंत नहीं है, किंतु मैंने अपनी दिव्य शक्तियों का यह संक्षिप्त वर्णन किया है।
अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
10.40 न नहीं? अन्तः अंत? अस्ति है? मम मेरी? दिव्यानाम् दिव्य? विभूतीनाम् शक्तियों? परंतप हे शत्रुओं के संहारक? एषः यह? तु किंतु? उद्देशतः संक्षेप में? प्रोक्तः कहा गया है? विभूतेः शक्ति? विस्तरः विवरण? मया मेरे द्वारा।टिप्पणी भगवान की दिव्य शक्तियों की सीमा का वर्णन करना किसी के लिए भी असंभव है या उन्हें जानना असंभव है। उनकी शक्तियों या शक्तियों की कोई सीमा नहीं है। उनके बारे में जो कुछ भी व्यक्त किया जा सकता है, वह उनकी अनंत शक्तियों की तुलना में कुछ भी नहीं है।परंतप शत्रुओं के संहारक -- वह जो आंतरिक शत्रुओं को जलाता है, काम, क्रोध, लोभ, भ्रम, आदि।
इस श्लोक पर आनंद के साथ चिंतन करें
यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से आहरण करता है और आपके अपने पथ को सम्मान देता है।
10.40 न नहीं? अन्तः अंत? अस्ति है? मम मेरी? दिव्यानाम् दिव्य? विभूतीनाम् शक्तियों? परंतप हे शत्रुओं के संहारक? एषः यह? तु किंतु? उद्देशतः संक्षेप में? प्रोक्तः कहा गया है? विभूतेः शक्ति? विस्तरः विवरण? मया मेरे द्वारा।टिप्पणी भगवान की दिव्य शक्तियों की सीमा का वर्णन करना किसी के लिए भी असंभव है या उन्हें जानना असंभव है। उनकी शक्तियों या शक्तियों की कोई सीमा नहीं है। उनके बारे में जो कुछ भी व्यक्त किया जा सकता है, वह उनकी अनंत शक्तियों की तुलना में कुछ भी नहीं है।परंतप शत्रुओं के संहारक -- वह जो आंतरिक शत्रुओं को जलाता है, काम, क्रोध, लोभ, भ्रम, आदि।