बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha को इंस्टॉल करें

भगवद् गीता 10.15

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम | भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ||१०-१५||
svayamevātmanātmānaṃ vettha tvaṃ puruṣottama . bhūtabhāvana bhūteśa devadeva jagatpate ||10-15||
स्वामी शिवानंद ने इस श्लोक पर टिप्पणी नहीं की

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दार्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत

10.15 स्वयम् आप स्वयं? एव केवल? आत्मना अपने द्वारा? आत्मानम् स्वयं को? वेत्थ (तुम) जानते हो? त्वम् तुम? पुरुषोत्तम हे परम पुरुष? भूतभावन हे प्राणियों के स्रोत? भूतेश हे प्राणियों के स्वामी? देवदेव हे देवताओं के देव? जगत्पते हे विश्व के पालक।टिप्पणी पुरुषोत्तम का अर्थ है सभी पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ। वह चार रूप धारण करते हैं, अर्थात् प्राणियों का स्रोत, प्राणियों का स्वामी, देवताओं का देव और विश्व का पालक। इसलिए उन्हें पुरुषोत्तम कहा जाता है।देवदेव वह हैं जिनकी पूजा इंद्र और अन्य देवता भी करते हैं।जगत्पति प्रभु विश्व की रक्षा करते हैं और वेदों में दी गई शिक्षाओं के माध्यम से लोगों को मार्गदर्शन देते हैं। इसलिए विश्व के पालक का नाम दिया गया है।

इस श्लोक पर Ananda के साथ चिंतन करें

यह श्लोक आपके अंदर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से लाभ लेता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक पाठ, एक प्रश्न, हर रविवार। कुछ और नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी