कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् |
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ||१-३९||
kathaṃ na jñeyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum .
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana ||1-39||
हम जो कुलनाश के बुरे प्रभाव को स्पष्ट रूप से देख रहे हैं, उस पाप से मुख मोड़ना क्यों न सीखें, हे जनार्दन (कृष्ण)?
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
1.39 कथम् क्यों? न नहीं? ज्ञेयम् सीखना चाहिए? अस्माभिः हमें? पापात् पाप से? अस्मात् इस? निवर्तितुम् मुख मोड़ना? कुलक्षयकृतम् कुलनाश में? दोषम् दोष? प्रपश्यद्भिः स्पष्ट रूप से देख कर? जनार्दन हे जनार्दन।व्याख्या कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं है, लेकिन जानबूझकर किया गया पापी आचरण गंभीर अपराध है, जो हमारे जैसे बुद्धिमान लोगों के लिए अयोग्य है।
इस श्लोक पर आनंद के साथ विचार करें
यह श्लोक आपमें क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेता है और आपके पथ का सम्मान करता है।
1.39 कथम् क्यों? न नहीं? ज्ञेयम् सीखना चाहिए? अस्माभिः हमें? पापात् पाप से? अस्मात् इस? निवर्तितुम् मुख मोड़ना? कुलक्षयकृतम् कुलनाश में? दोषम् दोष? प्रपश्यद्भिः स्पष्ट रूप से देख कर? जनार्दन हे जनार्दन।व्याख्या कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं है, लेकिन जानबूझकर किया गया पापी आचरण गंभीर अपराध है, जो हमारे जैसे बुद्धिमान लोगों के लिए अयोग्य है।